बहाउल्लाह के स्वर्गारोहण के बाद, अब्दुल-बहा, बहाई धर्म के ‘प्रधान’।

अब्दुल-बहा – परिपूर्ण उदाहरण

अब्दुल-बहा के लेखों से उद्धरण

अब्दुल-बहा के लेख और वार्तायें आधी शताब्दी से भी अधिक समय के उनके कठिन रचनात्मक परिश्रम के परिणाम हैं। अब्दुल-बहा कोई अवतार नहीं थे और न ही कभी उन्होंने यह दावा किया कि उन्होंने ईश्वर से सीधे कोई प्रकटीकरण प्राप्त किया है। किन्तु, अपने अनुयायियों के साथ बहाउल्लाह की संविदा के केन्द्र होने के कारण और बहाई प्रकटीकरण के नियुक्त व्याख्याकार होने के नाते, उनके लेख व्याख्या करने के साथ-साथ बहाई ग्रंथ का हिस्सा भी हैं।

प्रकाशित पुस्तकों में अब तक संग्रहित उनकी असाधारण रचनाओं में व्यक्तिगत पत्राचार, सामान्य पत्र, विशेष विषयों की व्याख्या, पुस्तकें, प्रार्थनायें, कवितायें, सार्वजनिक वार्तायें और वार्तालापों की लिखित प्रतियां शामिल हैं। जो भी उनके संपर्क में आये उन्होंने अब्दुल-बहा को एक अलग शैली के लेखक और वक्ता के आदर्श के रूप में सम्मानित किया।

उनके शब्द इतने सादे और सीधे थे जैसे सूर्य का प्रकाश और सूर्य के प्रकाश की तरह ही सार्वभौमिक...

— योना नोगुची, जापानी लेखक

नीचे अब्दुल-बहा के लेखों और वार्ताओं के अंशों का एक संक्षिप्त संकलन दिया गया है।

यह निश्चित और निर्विवाद है कि मनुष्य का रचयिता मनुष्य की तरह नहीं है, क्योंकि एक शक्तिविहीन रचना एक अन्य प्राणी की रचना नहीं कर सकता। रचयिता, सृष्टिकर्ता के पास सम्पूर्ण पूर्णता होनी चाहिये ताकि वह रचना कर सके। यह अनिश्चित संसार अपूर्णताओं का उद्गम है; ईश्वर पूर्णताओं का मूल है। इस अनिश्चित संसार की अपूर्णतायें ही अपने आप में ईश्वर की पूर्णता को सिद्ध करती हैं।

(“कुछ प्रश्न: आध्यात्मिक समाधान” (सम आंसर्ड क्वेश्चन्स) पृ. 5)

ईश्वर एक है; मानवजाति एक है, धर्म के आधार एक हैं। और आइये, हम उसकी आराधना करें और उन सभी अवतारों और संदेशवाहकों की स्तुति करें, जिन्होंने उस ईश्वर की दीप्ति और महिमा का प्रदर्शन किया है।

(“लंदन में अब्दुल-बहा” पृ. 20)

सृष्टि के सर्वोच्च स्थान, सर्वोपरि तारा, सर्वाधिक श्रेष्ठ, सर्वाधिक महान पद, चाहे दृश्य हो या अदृश्य, चाहे प्रथम हो या अन्तिम, ईश्वर के अवतारों का है, इस तथ्य के बावजूद कि अधिकांशतः बाहरी रूप से उनकी अपनी निर्धनता के अलावा उनके पास कुछ भी नहीं होता।

( “द सिक्रेट ऑफ़ डिवाइन सिविलाइजे़शन” (दिव्य सभ्यता का रहस्य) )

ईश्वर के दिव्य अवतारों के पास एक व्यापक और सर्व- समावेशी भावना होती है। उन्होंने सब के जीवन-हित के लिये कार्य किये और सब को शिक्षा देने के निमित्त अपने को सेवारत रखा। उनके उद्देश्यों का क्षेत्र सीमित नहीं था; न हीं यह विस्तृत और सर्वसमावेशी था।

( “अब्दुल-बहा के लेखों से संकलन” )

दिव्य धर्मों की स्थापना मानवजाति को एक करने तथा विश्वव्यापी शांति के लिये की गई थी। कोई भी आन्दोलन जो मानव-समाज में शांति और सहमति लाता है वह सत्यतः एक दिव्य आन्दोलन होता है; कोई भी सुधार जो लोगों को एक मंडप-वितान की शरण में आने के लिये लोगों को प्रेरित करता है वह निश्चित रूप से स्वर्गिक प्रेरणा से अनुप्राणित होता है।

( “प्रोमलगेशन ऑफ़ युनिवर्सल पीस” )

अब नया युग आ चुका है और सृष्टि पुनर्जीवित हुई है। मानवजाति ने नवजीवन धारण किया है। शरद ऋतु समाप्त हो चुकी है और पुनर्जीवन देने वाला वसंत काल आ चुका है। सब कुछ अब नया हो गया है। कला और उद्योग का नवीकरण हुआ है, विज्ञान में नये आविष्कार हुये हैं, यहाँ तक की मानवीय क्रियाकलापों के रंग-ढंग, मसलन पहनावे और व्यक्तिगत कार्य, और यहाँ तक कि शस्त्रास्त्र-ये सब-के-सब नये हो गये हैं। कानून और हर सरकार के काम-काज के तरीके भी संशोधित किये गये हैं। नवीनीकरण आज के समय की पद्धति है।

और इन सभी नयेपन का स्त्रोत प्रभु-साम्राज्य के स्वामी का आश्चर्यजनक आशीष और कृपा है, जिसने पूरी दुनिया को नया स्वरूप प्रदान किया है। इसलिये, लोगों को अवश्य पुराने रीति-रिवाजों की सोच से पूरी तरह मुक्त हो जाना चाहिये ताकि उनका पूरा ध्यान इन नये सिद्धांतों पर केन्द्रित हो सके, क्योंकि ये ही इस समय के प्रकाश हैं और इस युग की चेतना है।

( “अब्दुल-बहा के लेखों से संकलन” )

वह समय आ रहा है जब दुनिया के सभी धर्म एक होंगे, क्योंकि सिद्धांतों में वे एक हो चुके हैं। यह देखते हुये कि अपने बाहरी स्वरूप में ही ये अलग हैं, विभाजन की कोई आवश्यकता नहीं है। मनुष्य की संतानों के बीच कुछ अज्ञानता के शिकार हैं, हमें उन्हें शिक्षित करने की ज़रूरत है, अन्य ऐसे बच्चों के समान हैं जो जब तक बड़े नहीं हो जाते तब तक उनका सार-सम्हाल और उन्हें शिक्षित किये जाने की ज़रूरत है, और कुछ रूग्नावस्था में हैं - इन्हें अवश्य ही हमें दिव्य उपचार देना चाहिये।

( “अमृतवाणी” (पेरिस टॉक्स) )

प्रेम वह सर्वाधिक महान विधान है जो इस शक्तिशाली और स्वर्गिक चक्र पर शासन करता है, वह अनोखी शक्ति है जो इस भौतिक संसार के विविध तत्वों को एक साथ जोड़ता है, वह सबसे बड़ी चुम्बकीय ताकत है जो इस खगोल के सभी ग्रहों की गति निर्धारित करता है।

( “अब्दुल-बहा के लेखों से संकलन” )

बहाउल्लाह ने एकता का एक वृत्त खींचा है, उन्होंने सभी लोगों को एक करने के लिये और विश्वव्यापी एकता के मंडप की शरण में एकत्र करने के लिये एक योजना दी है। यह दिव्य उदारता का आशीष है और जब तक हम अपने बीच इस एकता की वास्तविकता को नहीं पा लें तब तक हमें इसके लिये अपने दिल-ओ-जान से इसके लिये प्रयत्नशील रहना चाहिये। और जैसे हम आगे बढ़ेंगे हमारे अन्दर ताकत आ जायेगी।

( “अमृतवाणी” (पेरिस टॉक्स) )

किसी बगीचे में खिले फूलों के बारे में विचार करें। हालाँकि वे अलग-अलग किस्मों, रंग, रूप और आकार के होते हैं किन्तु वे एक ही फव्वारे के जलों से अभिसिंचित होते हैं, एक ही हवा के झोंकों से जीवन पाते हैं, एक ही सूर्य की रोशनी उनमें शक्ति भरती है। इस विविधता से उनका आकर्षण और बढ़ता है और उनकी सुन्दरता का विकास होता है। यदि सभी फूल और पौधे एक ही रंग-रूप के होते तो यह देखने में कितना अप्रिय लगता! रंग, रूप और आकार की विविधता बगीचे को समृद्ध और सुन्दर बनाती है, और उसके प्रभाव को बढ़ाती है। इसी तरह, जब अलग-अलग प्रकार के विचार, स्वभाव और चरित्र एक केन्द्रीय कारक की शक्ति और प्रभावशीलता के दायरे में लाए जायेंगे तो मानवीय पूर्णता की गरिमा और सुन्दर प्रकट होकर अपनी झलक दिखाएगी। सभी वस्तुओं के यथार्थ पर शासन करने वाली और उन सबसे श्रेष्ठ ’ईश्वर की वाणी‘ की स्वर्गिक शक्ति के सिवा और कुछ भी नहीं है जो मानव-पुत्रों के इन विभिन्न विचारों, भावनाओं, संकल्पनाओं और धारणाओं को एक लय में ढाल सके।

( “दिव्य योजना की पातियाँ” )

सच्चाई आस्था की आधारशिला है। तात्पर्य यह कि एक धार्मिक व्यक्ति को अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं की उपेक्षा अवश्य करनी चाहिये और जैसे भी सम्भव हो सके, पूरे मन से उसे जनहित में सेवा देनी चाहिये और एक मनुष्य के लिये असम्भव है कि वह सच्ची धार्मिक आस्था के बगैर अपने स्वार्थी लाभों से मुँह मोड़ ले और अपने हित का त्याग समुदाय के हित के लिये करे।

( “द सिक्रेट ऑफ़ डिवाइन सिविलाइजे़शन” (दिव्य सभ्यता का रहस्य) )

सच्ची सभ्यता का ध्वज दुनिया के दिलों के बीच तब लहरायेगा जब इसके कुछ प्रतिष्ठित और यशस्वी प्रभुतासम्पन्न लोग - श्रद्धा और संकल्प के देदीप्यमान आदर्श-सम्पूर्ण मानवजाति के लाभ और प्रसन्नता के लिये दृढ़ निश्चय और स्पष्ट दूरदर्शिता के साथ विश्वव्यापी शांति की स्थापना के लिये उठ खड़े होंगे। शांति को वे अपने सामान्य परामर्श का विषय अवश्य बनायें और अपने अधीन अधिकार के अंतर्गत हर सम्भव प्रयास करें कि दुनिया के देशों के एक महासंघ की स्थापना करें। वे अवश्य ही एक बाध्यकारी समझौते पर सहमत हों और एक संविदा स्थापित करें, जिसके प्रावधान ठोस, अलंध्य और सुनिश्चित हों। वे इसका उद्घोष पूरे विश्व में करें और सम्पूर्ण मानवजाति की स्वीकृति प्राप्त करें। यह सर्वोच्च और महान दायित्व - दुनिया में शांति और कल्याण का सच्चा साधन उन सबके द्वारा पावन माना जाना चाहिये जो धरती पर निवास करते हैं।

( “द सिक्रेट ऑफ़ डिवाइन सिविलाइजे़शन” (दिव्य सभ्यता का रहस्य) )

बच्चों का शिक्षण-प्रशिक्षण मनुष्य द्वारा किये गये कार्यों में सर्वाधिक प्रशंसनीय है और सर्वदयालु की कृपा तथा अनुकम्पा आकर्षित करता है, क्योंकि शिक्षा सभी मानवीय उत्कृष्टताओं की अनिवार्य आधारशिला है और मनुष्य को उच्चता के शिखर पर जाने में सहायता प्रदान करता है।

( “अब्दुल-बहा के लेखों से संकलन” )

मानव की वास्तविकता उसका विचार है, उसका भौतिक शरीर नहीं। विचार शक्ति तथा पाशविक शक्ति हिस्सेदार हैं। यद्यपि मानव पाशविक सृष्टि का भाग है, परन्तु उसे विचार शक्ति प्राप्त है जो अन्य सभी सृजित जीवों से उत्तम है।

यदि किसी व्यक्ति का ध्यान लगातार स्वर्गिक विषयों में लगा रहे तो वह साधु-संत जैसा बन जाता है; दूसरी ओर यदि उसका विचार ऊपर की ओर उड़ान नहीं भरता परन्तु नीचे की ओर इस संसार की वस्तुओं पर केन्द्रित होता है तो वह ज्यादा से ज्यादा भौतिकवादी बन जाता है, यहाँ तक कि वह ऐसी दशा में पहुँच जाता है जहाँ पर कि वह मात्र पशु से बेहतर नहीं होता।

कुछ पुरूष तथा स्त्रियाँ अपने महान विचारों पर गौरव का अनुभव करते हैं, परन्तु यदि वे विचार कार्यरूप में परिणित नहीं होते तो वे बेकार होते हैं; विचार की शक्ति कार्यरूप में इसकी प्रत्यक्षता पर निर्भर है।

( “अमृतवाणी” (पेरिस टॉक्स) )

जब युद्ध का विचार आये तो उसका सामना शांति के अधिक शक्तिशाली विचार से करें। घृणा के विचार को निश्चय ही प्रेम के अधिक प्रबल विचार से ध्वस्त कर दें।

( “अमृतवाणी” (पेरिस टॉक्स) )

हे तुम, प्रभु के प्रियजनों! इस पावन युगधर्म में संघर्ष और विवाद करने की किसी को भी अनुमति नहीं हैं हर आक्रमणकारी स्वयं को ईश्वर की कृपा से वंचित कर लेता है।

( “अब्दुल-बहा की वसीयत और इच्छा-पत्र” )

पूरी एकता में रहो। एक-दूसरे से कभी क्रोधित न हो... प्राणियों को ईश्वर के निमित्त प्रेम करो, उनके लिये नहीं। अगर तुम ईश्वर के निमित्त उनसे प्रेम करते हो तो कभी भी तुम क्रुद्ध अथवा अधीर नहीं होगे। मानवजाति कभी सम्पूर्ण नहीं हो सकती, कोई-न-कोई अपूर्णता प्रत्येक मनुष्य में रह जाती है, और तुम बराबर अप्रसन्न रहोगे अगर तुम केवल उन लोगों को ही देखोगे। लेकिन अगर तुम ईश्वर की ओर देखते हो तो तुम उन्हें प्यार करोगे और उनके प्रति दयालु बनोगे, क्योंकि ईश्वर का लोक सम्पूर्णता और पूर्ण दया का लोक है।

( “द प्रोमलगेशन ऑफ़ युनिवर्सल पीस” )

आज के समय में अत्यावश्यक कर्तव्य है अपने चरित्र को शुद्ध करना, अपने व्यवहार को ठीक रखना और अपने आचरण को परिष्कृत करना। दयालु प्रभु के प्रियजन अपने प्राणियों के बीच ऐसे चरित्र और आचरण का प्रदर्शन करें कि उनकी पावनता की सुरभि सारी दुनिया में फैल जाये और मृत को जीवन दे, क्योंकि ईश्वर के अवतार और उस अदृश्य के असीम प्रकाश के प्रभात का उद्देश्य मनुष्यों की आत्माओं को शिक्षित करना है, और प्रत्येक जीवित मनुष्य के चरित्र को परिष्कृत करना है, ताकि वैसे आशीर्वादित लोग, जिन्होंने अपने-आपको पशु जगत के अंधेरे से मुक्त कर लिया है वैसे गुणों से सम्पन्न हो जायें जो मनुष्य की वास्तविकता के अलंकरण हैं।

( “अब्दुल-बहा के लेखों से संकलन” )

यदि आप पूरे मन से पृथ्वी के प्रत्येक जाति के साथ मित्रता चाहते हैं तो आपके आध्यात्मिक तथा रचनात्मक विचारों का निश्चय ही प्रसार होगा। यह दूसरों की भी इच्छा बन जायेगी और निरन्तर दृढ़ होती जायेगी; यहाँ तक कि यह सभी मनुष्यों के मन पर छा जायेगी।

( “अमृतवाणी” (पेरिस टॉक्स) )

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