बहाउल्लाह के भौतिक अवशेष की चिरविश्राम स्थली बहजी में है, जो बहाईयों के लिए धरती पर सर्वाधिक पवित्र स्थान है।

बहाउल्लाह – दिव्य शिक्षक

बहाउल्लाह का जीवनवृत्त

अप्रैल, 1863, स्त्री और पुरूष, युवा और वृद्ध, जीवन के हर क्षेत्र से, बगदाद स्थित टिगरिस नदी के किनारों की ओर जाने वाले आम रास्ते पर ’उसे‘ विदाई देने के लिये एकत्र हुये, जो उनका मित्र उनका सांत्वनादाता और उनका मार्गदर्शक बन चुका था।

मिर्जा हुसैन-अली - बहाउल्लाह के नाम से प्रख्यात- उनके बीच से निर्वासित किये जा रहे थे। बाब, जिनकी शिक्षायें कोई दो दशक पहले पूरे फारस पर प्रभाव डाल चुकीं थीं, के एक प्रमुख अनुयायी के रूप में बहाउल्लाह ने सुविधा-प्राप्त जीवन से स्वयं को वंचित कर लिया था, जिसमें वह जन्मे थे और उसके बदले आजीवन कारावास और निर्वासित अवस्था में जीना स्वीकार किया था।

लेकिन निराशा को शीघ्र ही आशा में बदलना था: बगदाद के माहौल को छोड़ने के पहले बहाउल्लाह अपने साथियों के समक्ष वह घोषणा करने वाले थे जिसके विषय में अनेक लोग पहले ही अनुमान लगा चुके थे - कि ‘वह’ ‘दिव्य’ ‘शिक्षक’ थे जिनके आगमन की अग्रिम घोषणा बाब कर चुके थे जो इतिहास के एक ऐसे काल में नये युग के प्रवर्तक हुये, जब अतीत के अत्याचार और अन्याय के शासन का अंत हो जायेगा ओर उसके स्थान पर शांति और न्याय का संसार होगा, जो मानवजाति की एकता के सिद्धांतों का मूर्तरूप होगा।

“दिव्य वसंत आ गया है!” उन्होंने सुस्पष्ट रूप से घोषणा की।

प्रारम्भिक जीवन

12 नवम्बर, 1817 को तेहरान, ईरान में जन्मे, मिर्ज़ा हुसैन अली ने एक कुलीन परिवार में जन्म लेने के कारण सभी सुविधाओं का लाभ उठाया। बचपन से ही उन्होंने असाधारण ज्ञान और विवेक का प्रदर्शन किया।

तेहरान, ईरान का वह नगर जहाँ बहाउल्लाह का जन्म हुआ था।

बड़े होने पर अपने पिता की तरह एक सरकारी नौकरी करने के स्थान पर मिर्ज़ा हुसैन अली ने गरीबों की देख-भाल करना पसंद किया और उसी में अपना अधिकांश समय व्यतीत किया। उन्हें उच्च पद प्राप्त करने में कोई रूचि नहीं थी।

बाब के धर्म को स्वीकारने के बाद इस कुलीन युवा और ‘उसके’ परिवार का जीवन पूरी तरह बदल गया। हालाँकि वे व्यक्तिगत रूप से कभी मिले नहीं, लेकिन जिस पल मिर्ज़ा हुसैन अली ने बाब के संदेश के बारे में सुना उन्होंने अपना सम्पूर्ण विश्वास उसमें व्यक्त कर दिया और उसके प्रसार में अपनी पूरी ताकत और प्रभाव लगा दिया।

सन 1848 में, ईरान के उत्तर-पूर्व में स्थित बदश्त नाम के गाँव में बाब के अनुयायियों की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। बैठक की कार्यवाही में मिर्ज़ा हुसैन अली ने एक प्रभावी भूमिका निबाही, जिस कारण नये धर्म के स्वतंत्र अस्तित्व को पुष्ट किया जा सका। तब से मिर्ज़ा हुसैन अली बहाउल्लाह के नाम से जाने गये, जिस अरबी शब्द का अर्थ होता है “ईश्वर का प्रकाश”

जैसे-जैसे बाब के अनुयायियों का समुदाय बढ़ा, वैसे-वैसे इसने कठोर विरोध को बढ़ावा दिया। हज़ार-ओ-हज़ार लोग अत्यन्त क्रूर और पाशविक व्यवहार के शिकार बने और अनेक को मार दिया गया। जब तीन सौ बाबी शेख तबरसी नामक एक उजाड़ समाधि के परिसर में शरण लेने गये तब बहाउल्लाह उनका साथ देने गये, लेकिन वहाँ तक पहुँचने से उन्हें रोक दिया गया।

सन् 1850 में बाब को जनसमूह के सामने प्राणदंड दिया गया। जब बाब के अधिकांश समर्थक मार दिये गये थे तब यह स्पष्ट हो गया था कि बहाउल्लाह एकमात्र व्यक्ति थे जिनकी ओर बचे हुये बाबी आशा भरी दृष्टि से देख सकते थे।

प्रकटीकरण

सन् 1852 में, ईरान के बादशाह नसीरूद्दीन शाह पर आघात में सह-अपराधी होने का झूठा आरोप बहाउल्लाह पर लगाया गया। ‘उनको’ बंदी बनाने आये लोगों को तब बड़ा आश्चर्य हुआ जब वारंट जारी होने पर, आरोप लगाने वालों से मिलने के लिये ‘वे’ स्वयं आगे आये। ज़जीरों से बांध कर नंगे पाँव भीड़ भरी गलियों से होकर एक कुख्यात भूमिगत बन्दीगृह में उन्हें ले जाया गया, जिसे कालकोठरी के नाम से जाना जाता था।

वह भूमिगत बन्दीगृह कभी जन-स्नान के लिये तालाब के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। इसकी दीवारों के बीच ठंढ और दुर्गंधपूर्ण हवा में ज़जीरों के असहनीय बोझ के साथ एक-दूसरे से बांध कर बंदियों को रखा जाता था, जिसने बहाउल्लाह के शरीर पर जीवन भर के लिये अपने निशान छोड़ दिये थे।

ऐसे कठोर वातावरण में अत्यन्त असाधारण और सर्वाधिक प्रिय घटना एक बार फिर घटी: एक नश्वर मनुष्य, देखने में हर तरह से मानव, ईश्वर द्वारा मानवजाति के लिये एक नया संदेश लाने को चुना गया।

मूसा, ईसा और मुहम्मद के जीवन में दिव्य प्रकटीकरण के अनुभव की शेष बचे ऐतिहासिक विवरण में केवल अप्रत्यक्ष रूप से हल्की चर्चा मिलती है, लेकिन बहाउल्लाह के अपने शब्दों में उनका विवरण कुछ इस प्रकार है: “जिन दिनों ‘मैं’ ईरान के बन्दीगृह में था, हालाँकि ज़जीरों के भारी बोझ और दुर्गन्ध से भरी हवा ने ‘मुझे’ कम ही सोने दिया, फिर भी नींद के विरल पलों में मैंने ऐसा महसूस किया कि ‘मेरे’ सिर के ऊपर से ‘मेरी’ छाती पर निरन्तर कुछ प्रवाहित हो रहा है, जैसे किसी ऊँचे पर्वत से धरती पर प्रचण्ड धार गिर रही हो। ...ऐसे पलों में ‘मेरी’ जिह्वा ने जो भी कहा उसे कोई मनुष्य सुन नहीं सकता था।’’

बग़दाद के लिये निर्वासन

चार महीनों की प्रचण्ड पीड़ा के बाद बहाउल्लाह को, जो अब बीमार रहा करते थे और बुरी तरह थक चुके थे, कैदमुक्त कर ‘अपने’ देश से सदा के लिये निर्वासित कर दिया गया। उन्हें और उनके परिवार को बग़दाद भेजा गया। वहाँ बाब के शेष बचे अनुयायियों ने नैतिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिये बहाउल्लाह की ओर और भी निहारा। ‘उनके’ चरित्र की उच्चता, ‘उनकी’ सलाह की प्रज्ञा और ‘उनकी’ दयालुता जो सब पर समान रूप से बरसती रही और ‘उनमें’ अतिमानवीय महानता के बढ़ते हुये लक्षणों ने पददलित समुदाय को पुनर्जीवित किया।

बाब के अनुयायियों को नेतृत्व प्रदान करने वाले के रूप में बहाउल्लाह का उभर कर सामने आना उनके महत्वाकांक्षी सौतेले भाई मिर्ज़ा याह्या की ईष्र्या का कारण बना। मिर्ज़ा याह्या ने अनेक शर्मनाक कोशिशें कीं कि वह बहाउल्लाह के चरित्र की निन्दा करे और ‘उनके’ साथियों के बीच संदेह और अविश्वास के बीज बोये। तनाव का कारण ‘वह’ न बन जायें, इसलिये बहाउल्लाह कुर्दिस्तान की पहाड़ियों पर चले गये, जहाँ ‘वह’ दो सांलों तक रहे और ‘अपने’ दिव्य उद्देश्य पर चिन्तन-मनन करते रहे। ‘उनके’ जीवन का यह समय हमें सिनाई पर्वत पर मूसा के चले जाने, उजाड़-बीयाबान में ईसा के भटकने और अरब की पहाड़ियों पर मुहम्मद के चले जाने की याद दिलाता है।

फिर भी, इस सुदूर क्षेत्र में भी बहाउल्लाह की ख्याति फैली। लोगों ने सुना कि एक असाधारण बुद्धिकौशल वाला और अर्थपूर्ण बातें करने वाला व्यक्ति वहाँ उपलब्ध था। जब उनके बारे में ऐसी बातें बगदाद पहुँचनी शुरू हुईं तब बाबियों ने एक शिष्टमंडल को वहाँ यह सोचकर भेजा कि सम्भवतः वह बहाउल्लाह ही हों। शिष्टमंडल ने उन्हें बगदाद वापस आने का आग्रह किया।

बगदाद वापस आकर एक बार फिर बहाउल्लाह ने बाब के अनुयायियों में जान डाल दी; समुदाय का महत्व बढ़ा और बहाउल्लाह की ख्याति और भी बढ़ गई। इस दौरान उन्होंने अपनी तीन महत्वपूर्ण रचनायें लिखीं – निगूढ़ वचन , सात घाटियाँ और किताब-ए-ईकान । हालाँकि बहाउल्लाह की रचनायें उनके पद की ओर संकेत देती हैं, लेकिन अभी भी वह समय नहीं आया था कि सार्वजनिक घोषणा की जा सकती थी।

जैसे-जैसे बहाउल्लाह की ख्याति बढ़ती गई, कुछ धर्माधिकारियों की ईष्र्या और द्वेष फिर भड़का। ईरान के शाह से निवेदन किया गया कि वह ओटोमन के सुल्तान को कहें कि बहाउल्लाह को ईरान के बार्डर से बाहर भेज दिया जाये और एक दूसरे निर्वासन का आदेश जारी किया गया।

रिदा बिग के घर का आधुनिक स्वरूप, बहाउल्लाह का एड्रियनोपल में एक साल तक निवास-स्थान। सुल्तान सलीम की मस्जिद पृष्ठभूमि में है।

अप्रैल, 1863 के अंत में, बगदाद के माहौल को इस्ताम्बूल(उस समय की अंग्रेजी भाषा में कॉन्स्टैंटिनोपल के नाम से प्रसिद्ध) के लिये छोड़ने के कुछ समय पहले बहाउल्लाह और ‘उनके’ संगी-साथी बारह दिनों के लिये एक बगीचे में रहे, जिसे ‘उन्होंने’ ’रिज़वान’ नाम दिया, जिसका अर्थ होता है “स्वर्ग”। टिगरिस नदी के किनारों पर स्थित इसी रिज़वान के बाग में ‘उन्होंने’ घोषणा की कि वही ‘वह’ हैं जिनके आगमन की पूर्व घोषणा बाब ने की थी - मानवजाति की सामूहिक वयस्कता प्राप्त करने वाले युग के ईश्वरीय संदेशवाहक, जिसकी भविष्यवाणी दुनिया के सभी धर्मग्रंथों में की गई है।

अगला निर्वासन

बगदाद छोड़ने के तीन महीने बाद बहाउल्लाह और उनके साथ निर्वासित लोग कॉन्स्टैंटिनोपल पहुँचे। वे अभी वहाँ केवल चार महीने ही रहे थे कि अगले निर्वासन का फरमान मिल गया और एडिरने (एड्रियनोपल) भेज दिये गये, भीषणतम शीत के मौसम की एक थका देने वाली यात्रा। एड्रियनोपल में जो स्थान उन्हें रहने के लिये दिया गया वह कटु खाने वाले तापमान में राहत देने वाला नहीं था।

बहाउल्लाह ने एड्रियनोपल को एक ’सुदूर बन्दीगृह’ कहा है। फिर भी, जिन असत्कारशील परिस्थितियों में निर्वासितों को रहने के लिये बाध्य किया गया था, बावजूद उसके बहाउल्लाह की लेखनी से प्रेरित पदों का प्रवाह बना रहा और संदेश मिस्त्र तथा भारत जैसे दूरस्थ देशों में पहुँचा।

इस दौरान मिर्ज़ा याह्या, बहाउल्लाह का ईष्यालु सौतेला भाई, उन्हें ज़हर देने में सफल हो गया। इस दुःखद घटना ने बहाउल्लाह को कम्पन्न की बीमारी से ग्रस्त कर दिया जो उनकी हस्तलिपि में आजीवन बना रहा।

बहाउल्लाह ने सितम्बर 1867 के प्रारम्भ में, विभिन्न देशों के नेताओं और शासकों को शृंखलाबद्ध पत्र लिखे। इन दूरदर्शी पत्रों में ‘उन्होंने’ खुल कर ‘अपने’ पद और स्थान की घोषणा की, एक नये युग के आरम्भ होने की चर्चा की, लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि पहले दुनिया की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में भयंकर उथल-पुथल होगी। उन्होंने दुनिया के नेताओं को न्याय के पथ का अनुसरण करने का आह्वान किया और उनसे कहा कि एक ऐसी सभा वे बुलायें जहाँ वे सब मिलें और युद्ध को पूरी तरह समाप्त करने के उपायों पर विचार करें। उन्होंने कहा कि सामूहिक रूप से कार्य करने पर ही स्थायी शांति स्थापित की जा सकती है। उनकी चेतावनियों की ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया।

किताब-ए-अकदस की वह प्रति जिसे अब्दुल-बहा ने 1902 में अधिकृत किया था।

बहाउल्लाह के निन्दकों द्वारा लगातार अशांति फैलाये जाने के कारण ओटोमन सरकार को ‘उन्हें’ अंतिम निर्वासन पर भेजना पड़ा, सबसे ज्यादा कुख्यात दण्डितों की बस्ती में। 31 अगस्त 1868, को भूमध्यसागर की कारा-नगरी अक्का में आने के बाद बहाउल्लाह को अपना शेष जीवन उसी किलाबन्द नगर और उसके इर्द-गिर्द बिताना था।

दो सालों से अधिक समय तक एक कैदखाने में बंद रखने के बाद ‘उन्हें’ और ‘उनके’ साथियों को नगर की चहारदिवारी के अंदर ही एक तंग मकान में भेज दिया गया। धीरे-धीरे बहाईयों के नैतिक चरित्र-ख़ासकर बहाउल्लाह के ज्येष्ठ पुत्र अब्दुल-बहा-के व्यवहार ने जेलरों के हृदय को द्रवित किया और अक्का के निवासियों की कट्टरता और उपेक्षा को हटा दिया। बगदाद और एड्रियनोपल की तरह ही बहाउल्लाह के चरित्र की श्रेष्ठता ने लोगों के दिलों को जीत लिया और नेतृत्व प्रदान करने वाले लोग भी उनसे प्रभावित हुये।

अक्का में बहाउल्लाह ने ‘अपनी’ सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुस्तक किताब-ए-अकदस (परम पावन पुस्तक) प्रकट की, जिसमें उन्होंने ‘अपने’ धर्म के आवश्यक विधानों और सिद्धांतों की रूपरेखा प्रस्तुत की है, और एक विश्वव्यापी प्रशासनिक व्यवस्था की आधारशिला स्थापित की है।

अंतिम वर्ष

1870 के दशक के अंतिम वर्षों में, बहाउल्लाह को- जो अभी भी कैदी थे- थोड़ी छूट दी गई कि वह नगर की चहारदीवारी के बाहर जा सकते थे, ताकि उनके अनुयायी थोड़े शांत माहौल में उनसे मिल सकें। अप्रैल, 1890 में, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एडवर्ड ब्राउन बहाउल्लाह से अक्का के निकट उस भवन में मिले जहाँ वह उन दिनों रह रहे थे।

माज़राई का मकान - उन घरों में से एक जिसमें बहाउल्लाह कारा-नगरी अक्का से मुक्त होकर रुके थे।

उनकी मुलाकात के विषय में ब्राउन ने लिखा: “उनका चेहरा, जिसे मैंने ग़ौर से देखा, मैं कभी भूल नहीं सकता, हालाँकि, उसका वर्णन नहीं कर सकता। अंदर तक भेद जाने वाली वे आँखें जैसे किसी की आत्मा को पढ़ सकती थीं; उनके विशाल मस्तक पर जैसे शक्ति और प्रभुत्व विराजमान हो... यह पूछने की कोई ज़रूरत नहीं कि मैं किनकी उपस्थिति में खड़ा था, क्योंकि मैं एक ऐसे व्यक्ति के समक्ष नतमस्तक हुआ था जो श्रद्धा और प्रेम का पात्र था, जिससे राजा-महाराजा शायद ईष्र्या करें और शासकगण जिसकी निरर्थक प्रबल इच्छा रखें।”

बहाउल्लाह का स्वर्गारोहण 29 मई, 1892 को हुआ। ‘अपनी’ वसीयत में उन्होंने अब्दुल-बहा को ‘अपना’ उत्तराधिकारी और बहाई धर्म का प्रधान नामज़द किया। इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि एक विश्व-धर्म के संस्थापक ने अखंडनीय, लिखित रूप में अपने उत्तराधिकारी को नामज़द किया हो। एक उत्तराधिकारी का यह चुनाव वह केन्द्रीय प्रावधान है जिसे “बहाउल्लाह की संविदा” के रूप में जाना जाता है, और सम्पूर्ण बहाई समुदाय को हर समय एकसूत्र में बांधे रखने के लिये प्रेरित करता है।

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