शोगी एफेंदी द्वारा सन् 1952 में तैयार किया गया नक्शा जिसमें बहाई धर्म के विश्वव्यापी विकास को दर्शाया गया है।

शोगी एफेंदी – बहाई धर्म के संरक्षक

शोगी एफेंदी का जीवन और कार्य

36 सालों तक, 1921 से 1957 में अपने देहावसान के समय तक शोगी एफेंदी ने बहाई धर्म के संरक्षक के रूप में नियुक्त किये गये कार्यों में अपने आपको पूरी तरह तल्लीन कर लिया। पूरे विश्व में बहाई समुदाय के विकास के एक महत्वपूर्ण काल में उनके मार्गदर्शक कार्यों ने विकास और गति को दिशा प्रदान की।

प्रारम्भिक जीवन

शोगी एफेंदी बाल्यावस्था में

बाब और बहाउल्लाह दोनों से सम्बन्धित शोगी एफेंदी का जन्म अक्का में तब हुआ जब उनके नाना अब्दुल-बहा कैदी थे। अपने प्रारम्भिक वर्षों से ही अपने नाना के प्रति गहरे भक्तिभाव और धर्म के प्रति निष्ठा ने शोगी एफेंदी के प्रत्येक कार्य को प्रेरित किया। वह अंग्रेजी भाषा में निपुणता प्राप्त करना चाहते थे ताकि अब्दुल-बहा के सचिव और अनुवादक के रूप में अपनी सेवा दे सकें, और इसीलिये, 1920 के वसंत काल में वह ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के लिये रवाना हुये, जहाँ उन्होंने अंग्रेजी पर प्रभावशाली अधिकार हासिल किया।

नवम्बर, 1921 में जब अब्दुल-बहा की मृत्यु हो गई तब शोगी एफेंदी जैसे टूट-से गये। गहरे दुःख की अवस्था में उन्हें पता चला कि अब्दुल-बहा ने अपनी वसीयत और इच्छा-पत्र में उन्हें बहाई धर्म का संरक्षक नियुक्त किया था।

अपने व्यक्तिगत दुःख के बावजूद, शोगी एफेंदी ने बड़ी कर्मठता के साथ अपने इतने बड़े दायित्व को सम्हाला। उन प्रावधानों को कार्यरूप देने के लिये उन्होंने स्वयं को तैय्यार किया जिन्हें उन्होंने बहाई धर्म के तीन “घोषणा-पत्र” की संज्ञा दी: बहाउल्लाह की कार्मल की पाती जिसमें पवित्र भूमि में बहाई विश्व केन्द्र के विकास के लिये आदेश सुस्थापित किया गया है; अब्दुल-बहा की वसीयत और इच्छा-पत्र , बहाई प्रशासन के क्रमिक विकास के ढ़ाँचे की रूपरेखा; और अब्दुल-बहा की दिव्य योजना की पातियां , जिसमें बहाई समुदाय के विश्वव्यापी विस्तार के लिये मार्गदर्शन उपलब्ध हैं।

अब्दुल-बहा की मृत्यु के बाद बहाई धर्म ने विकास के एक नये चरण में प्रवेश किया। जैसी कि शोगी एफेंदी ने व्याख्या की है, इसका “धर्म प्रचारक युग” अथवा “शूरवीरों का युग” समाप्त हो चुका है और इसके “रचनात्मक काल” की शुरूआत हो चुकी है। संरक्षक के रूप में उनका अपना स्थान ऐसे कार्यों और नेतृत्व की शैली अब्दुल-बहा की शैली से बिल्कुल अलग है।

सन् 1937 में शोगी एफेंदी ने मोंट्रियल, कनाडा की मेरी मैक्सवेल से विवाह किया, जो बहाइयों के बीच अमातुल-बहा रूहिया खानम के नाम से जानी गयीं। कुछ सालों बाद कनाडा के बहाइयों को भेजे गये एक संदेश में धर्मसंरक्षक ने उन्हें “मेरी पत्नी, मेरी रक्षक... और जो काम मैंने अपने कंधों पर लिया है उनमें मेरी अथक सहयोगी” के रूप में वर्णित किया है।

बहाई प्रशासन का निर्माण

बहाउल्लाह की प्रशासनिक व्यवस्था का विकास शोगी एफेंदी द्वारा ध्यान दिये जाने का प्रमुख केन्द्र बिन्दु था। जैसे-जैसे बहाई संस्थायें विकसित हुईं उन्होंने बहाई समुदाय के मानव और भौतिक संसाधनों को दिव्य योजना को लागू करने के आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराये। विकसित हो रहे समुदाय के काम-काज को व्यवस्थित करने के लिये पहली आवश्यकता थी निर्वाचित स्थानीय और राष्ट्रीय बहाई संस्थाओ का ढाँचा खड़ा करना। शोगी एफेंदी ने इन नवजात संस्थाओं को मार्गदर्शन प्रदान किया ताकि वे बहुतायत में आवश्यक गतिविधियों को संचालित कर सकें, मसलन, प्रभुधर्म का संदेश देने को प्रोत्साहित करना, साहित्य का प्रकाशन और सामुदायिक जीवन को व्यवस्थित करना - इस बीच का समय यह सीखना कि परामर्श के बाद लिये गये निर्णय किस प्रकार लिये जायें, जो प्रणाली बहाउल्लाह द्वारा सुझायी गई थी।

सन 1937 में, अब्दुल-बहा की मृत्यु के 16 साल बाद, अनेक देशों में प्रशासनिक क्षमता पर्याप्त रूप से इतनी बढ़ चुकी थी कि शोगी एफेंदी बहाई शिक्षाओं के प्रसार के लिये योजनाओं को लागू कर सकते थे और पूरी धरती पर दिव्य योजना की पातियों के उद्देश्यों के अनुकूल बहाई समुदायों की स्थापना कर सकते थे।

इस काम का नेतत्व और समर्थन करने के लिये धर्मसंरक्षक ने धर्मभुजाओं को नियुक्त करना शुरू कर दिया था, प्रत्येक महाद्वीप से विशिष्ट लोगों का समूह, जिन्हें उन्होंने बाद में “बहाउल्लाह के प्रारम्भिक विश्व महासंघ के प्रधान सेवकों” की संज्ञा दी। इन उच्च स्तरीय अनुयायियों के निकाय का काम बहाई शिक्षाओं के प्रसार में नेतृत्व प्रदान करना, सीखने को प्रोत्साहित करना, आध्यात्मिक सभाओं को उनके कर्तव्यों के अनुपालन में सहयोग प्रदान करना था। 1951 में शोगी एफेंदी ने एक अंतर्राष्ट्रीय बहाई परिषद के सदस्यों को नियुक्त किया जिन्हें उन्होंने विश्व न्याय मंदिर का अग्रगामी कहा। 1954 में धर्मभुजाओं को सहयोग प्रदान करने के लिये सहायक मंडल सदस्यों का एक विश्वव्यापी नेटवर्क गठित किया गया।

बहाई समुदाय का विस्तार

अब्दुल-बहा की दिव्य योजना - हर भाग में बहाई धर्म को संस्थापित करना - के उद्देश्यों को कार्यरूप में परिणित करने के लिये प्रारम्भ में धर्मसंरक्षक ने तुलनात्मक रूप से बहाइयों के एक छोटे से दल को प्रोत्साहित किया कि वे दुनिया भर में फैल जायें। कुछ तुरंत उठ खड़े हुये। उनमें अग्रणी थीं एक अमेरिकी पत्रकार, मार्था रूट, जिन्होंने कोई चार बार दुनिया की यात्रा की और अनगिनत लोगों को बहाई संदेश दिया, जिनमें प्रमुख थीं रोमानिया की रानी मेरी, पहली राजवंशी महिला जिन्होंने शिक्षाओं को अपनाया। शोगी एफेंदी मार्था रूट के साथ लगातार पत्राचार करते रहे और अन्य अनेक साहसी व्यक्तियों के सम्पर्क में रहे, जिन्होंने प्रभुधर्म के लिये अपने घर-बार छोड़ दिये थे।

युवा शोगी एफेंदी

जब बहाइयों की संख्या और काम करने की उनकी क्षमता बढ़ी, तब शोगी एफेंदी ने प्रणालीबद्ध तरीके से अब्दुल-बहा की योजना को, जैसी दिव्य योजना की पातियों में निर्दिष्ट थी, कार्यरूप देना आरम्भ कर दिया; श्रृंखलाबद्ध विशेष योजनायें अनेक राष्ट्रीय बहाई समुदायों को प्रभुधर्म का प्रसार करने हेतु उन्होंने दीं। 1953 तक बहाई वह प्रारम्भ करने में समर्थ हो पाये जिसे उन्होंने “सौभाग्य से भरा, मर्मस्पर्शी, एक दशक तक चलने वाला, विश्व को अपने आलिंगन में कर लेने वाला अभियान” के रूप में चित्रित किया। इस अभियान के सहारे पूरी दुनिया में बहाइयों ने आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त किये। जब अब्दुल-बहा की मृत्यु हुई थी तब 35 देशों में बहाई धर्म जा चुका था, जिनमें कुछ स्थानों पर राष्ट्रीय स्तर पर वे प्रारम्भिक अवस्था में थीं। 1957 में शोगी एफेंदी की मृत्यु के समय तक बहाई 219 नये प्रभुसत्ता सम्पन्न राज्यों, अधीन राष्ट्रों और प्रमुख द्वीपों में निवास करने लग गये थे। 1963 तक 56 राष्ट्रीय स्तर पर निर्वाचित प्रशासनिक परिषदें - जिन्हें राष्ट्रीय आध्यात्मिक सभाओं के नाम से जाना गया - और 4500 से अधिक स्थानीय आध्यात्मिक सभायें हो गई थीं और बहाई 15000 से अधिक स्थानों में निवास करने लग गये थे।

बहाई विश्व केन्द्र

डिज़ाइन की गहरी सूझ-बूझ के साथ शोगी एफेंदी ने कार्मल पर्वत पर सुंदर उद्यानों को विकसित किया

अपने कार्यकाल में ही शोगी एफेंदी ने पवित्र भूमि में एक विश्वव्यापी धर्म के हृदय और स्नायु केन्द्र का निर्माण कर दिया था, उन सभी भौतिक बाधाओं को पार करते हुये जिन्हें अपार भौतिक बाधायें कहा जा सकता था।

इस सम्बन्ध में जिन अनेक कार्यों का दायित्व उन्होंने उठाया उनमें एक था बहाउल्लाह की समाधि और उससे जुड़े भवनों तथा ज़मीन की सुरक्षा। पूरी भू-सम्पदा का अधिग्रहण और उसके चारों ओर के वातावरण के सौन्दर्य को सुनिश्चित करना एक ऐसा दायित्व था जिसका निर्वहन उन्होंने मृत्युपर्यन्त किया।

हायफा में उन्होंने कार्मल पर्वत पर बाब की समाधि की अधिरचना के निर्माण-कार्य की देख-रेख की, जो अपने स्वर्णिम गुम्बज के साथ “कार्मल की रानी” के नाम से जाना गया। दोनों समाधियों के चारों ओर उन्होंने शानदार बागों को विकसित किया, बहाई इतिहास से जुडे अन्य अनेक स्थलों का सौन्दर्यीकरण किया, जिनमें अब्दुल-बहा की बहन, भाई, माँ और पत्नी की चिरविश्रामस्थली शामिल है।

कार्मल पर्वत पर प्रभुधर्म के विश्व प्रशासनिक केन्द्र की स्थापना को सुविधाजनक बनाने के उद्देश्य से शोगी एफेंदी ने पर्वत स्थली पर एक ’आर्क‘ का नक्शा तैय्यार किया, जिसके इर्द-गिर्द बहाई धर्म की अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के भवन होंगे। इन भवनों में पहला अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय भवन का काम उनकी मृत्यु के कुछ समय पहले ही पूरा हो चुका था।

संकट और विजय

शोगी एफेंदी के पूरे कार्यकाल के दौरान उन्होंने अनेक चुनौतियों से गुजर कर बहाई समुदाय का पथ-प्रदर्शन किया। नाज़ी शासन के अधीन जर्मन बहाइयों को उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा, टर्की में अनेक बहाइयों को कैद कर लिया गया और उनसे पूछताछ की गई; सन् 1920 और 1930 के दशक के दौरान सोवियत अधिकारियों द्वारा लगातार दिये गये उत्पीड़न को बर्दाश्त करने के बाद इश्काबाद के अति विकसित समुदाय को इधर-उधर बिखरने के लिये मजबूर होना पड़ा; ईरान में प्रभुधर्म को और भी व्यापक विरोध का सामना करना पड़ा, बगदाद में बहाउल्लाह के घर को ज़ब्त कर लिया गया जो फिर कभी वापस नहीं पाया जा सका।

बहजी में उद्यानों के विकास का निरीक्षण करते हुये शोगी एफेंदी

चरित्रगत शांत स्वभाव और प्रत्यक्ष ज्ञान से शोगी एफेंदी ने बहाइयों के सामने आये प्रत्येक प्रत्यक्ष संकट में विजय की सम्भावना देखी। उदाहरण के लिये, मिस्त्र में अदालतों ने एक क्रम से कुछ ऐसे फैसले दिये जो ऊपरी तौर पर प्रतिकूल लगीं लेकिन जिनका स्वागत शोगी एफेंदी द्वारा किया गया, क्योंकि उनसे बहाई धर्म के स्वतंत्र अस्तित्व की मान्यता सिद्ध हुई। एक ओर जहाँ मौलिक मानवाधिकारों के लिये उन्होंने राष्ट्रीय अदालतों और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कार्यवाही करने में मदद की वहीं उन्होंने सिखलाया कि कठिनाइयों को वे वैसे अवसरों के रूप में देखें जब प्रभुधर्म के काम को आगे ले जाया जा सकता हो।

शोगी एफेंदी का देहावसान

दायित्वों और कर्तव्यों के भारी बोझ को वहन करने के बावजूद धर्मसंरक्षक के पास जो भी समय बचता उसे वह पूरब और पश्चिम से पवित्र भूमि आने वाले तीर्थयात्रियों का अभिवादन करने में व्यतीत करते। वह उनसे मिलते, उन्हें प्रोत्साहित करते और सलाह देते और दुनिया भर में हो रहे समुदाय की प्रगति की ख़बरें साझा करते।

नवम्बर, 1957 को, जब वह बहाई विश्व केन्द्र के भवनों और उद्यानों की सज्जा-सामग्री खरीदने के लिये लंदन गये थे, शोगी एफेंदी का स्वर्गावास 60 साल की उम्र में अचानक हो गया। विश्व के बहाई गहरे शोक में डूब गये। उनकी चिरविश्रामस्थली उत्तरी लंदन के न्यू साउथगेट के समाधि-स्थल में है। आज पूरी दुनिया से आने वाले यात्रियों के लिये यह प्रार्थना और चिन्तन का स्थान है।

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