बहाई क्या मानते हैं
बहाउल्लाह और ‘उनकी’ संविदा
विश्व न्याय मंदिर
उद्धरण
- बहाई क्या मानते हैं
- बहाई क्या करते हैं
अपने संप्रेषणों के माध्यम से, विश्व न्याय मंदिर बढ़ते हुए वैश्विक बहाई समुदाय को विश्व सभ्यता के निर्माण में सहभागिता के लिए विश्लेषण, दृष्टि और दिशा प्रदान करता है। इनमें से एक पत्र हर वर्ष रिज़वान के पहले दिन बहाई समुदाय को संबोधित किया जाता है—जो सामान्यतः 20 या 21 अप्रैल को पड़ता है—जिसे 'रिज़वान संदेश' के नाम से जाना जाता है। समय-समय पर, विश्व न्याय मंदिर व्यापक समाज को भी संदेश संबोधित करता है, जिसमें धरती के कल्याण से जुड़े मुद्दों पर विचार प्रस्तुत किये जाते हैं।
नीचे विश्व न्याय मंदिर के संदेशों से कुछ संक्षिप्त अंश दिए गए हैं। इससे कहीं अधिक व्यापक संकलन बहाई संदर्भ ग्रंथालय में पाया जा सकता है।
अनेक समस्याओं की जड़ विघटन (एकता का अभाव) ही है जिससे पृथ्वी बहुत अधिक पीड़ित हो रही है। यह जीवन के हर क्षेत्र मे ं दृष्टिकोण को प्रभावित करता है। राष्ट्रों और लोगों के बीच जितने भी बड़े संघर्ष हैं, उनके मूल में भी यही विघटन है। इससे अधिक गंभीर बात यह है कि यह धर्मों के बीच और स्वयं धर्मों के अंदर भी आम तौर पर उपस्थित रहता है, जिससे उस आध्यात्मिक और नैतिक प्रभाव की शक्ति ही क्षीण हो जाती है जिसे वे देने के लिए मुख्य रूप से स्थापित किये गए थे।
बहाई समुदाय ने न्याय मंदिर द्वारा जारी वैश्विक योजनाओं की रूपरेखा के अंतर्गत पूर्ण मेहनत से कार्य किया है और एक ऐसे बहाई जीवन-प्रतिमान की स्थापना में सफलता प्राप्त की है, जो व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास को प्रोत्साहित करता है एवं अपने सदस्यों की सामूहिक ऊर्जाओं को समाज के आध्यात्मिक नवजीवन की दिशा में प्रवाहित करता है। इसने यह क्षमता अर्जित कर ली है कि बड़े पैमाने पर ग्रहणशील आत्माओं तक संदेश पहुँचाए, उन्हें दृढ़ करे, और जिन्होंने आस्था स्वीकारी है उनके लिए धर्म की मूल बातों की समझ को गहरा करे। इसने अपने संस्थापक द्वारा प्रतिपादित परामर्श के सिद्धांत को सामूहिक निर्णय लेने के एक प्रभावी उपकरण के रूप में परिवर्तित करना और अपने सदस्यों को इसके उपयोग के लिए शिक्षित करना सीख लिया है। इसने अपने छोटे सदस्यों के लिए आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा के कार्यक्रम बनाए हैं और इन्हें न केवल अपने बच्चों और किशोरों तक, बल्कि व्यापक समुदाय के बच्चों और किशोरों तक भी विस्तारित किया है। उपलब्ध प्रतिभा के भंडार के साथ, इसने समृद्ध साहित्य-भंडार रचा है जिसमें दर्जनों भाषाओं में ऐसी पुस्तकें हैं जो न केवल समुदाय की अपनी आवश्यकताओं बल्कि आम जनता की रुचि को भी संबोधित करती हैं। यह व्यापक समाज के कार्यों में लगातार अधिक सम्मिलित होता जा रहा है, सामाजिक और आर्थिक विकास की अनेक योजनाएँ संचालित की हैं ... इसने अपने मानव संसाधनों की बहुलता में उल्लेखनीय प्रगति की है, एक प्रशिक्षण कार्यक्रम के माध्यम से जो समुदाय के तृणमूल स्तर तक पहुँचता है और सतत् विकास के प्रतिमान स्थापित करने के लिए विधियाँ और साधन खोजे हैं।
हज़ारों-हज़ार लोग, पूरे मानव परिवार की विविधता को अपनाते हुए, रचनात्मक शब्दों का व्यवस्थित अध्ययन ऐसे वातावरण में कर रहे हैं जो गम्भीरता और उल्लास से भरा है। जब वे कार्य, चिन्तन और परामर्श की प्रक्रिया के माध्यम से अर्जित अन्तर्दृष्टियों को लागू करने का प्रयास करते हैं, तो वे पाते हैं कि धर्म की सेवा करने की उनकी क्षमता नये स्तर तक पहुँच रही है। प्रत्येक हृदय की अपने सृष्टिकर्ता से वार्ता की अंतरतम अभिलाषा के प्रत्युत्तर में, वे विविध वातावरणों में सामूहिक उपासना के कार्य करते हैं, प्रार्थना में दूसरों से एकजुट होते हैं, आध्यात्मिक संवेदनाओं को जाग्रत करते हैं और एक ऐसे जीवन-प्रतिमान का गठन करते हैं जो भक्ति-भावना के लिए विशिष्ट है। जब वे एक-दूसरे के घरों में जाते हैं और परिवारों, मित्रों तथा जान-पहचान के लोगों से मिलते हैं, तो वे आध्यात्मिक महत्व के विषयों पर उद्देश्यपूर्ण चर्चा करते हैं, धर्म के अपने ज्ञान को गहरा करते हैं, बहाउल्लाह का संदेश साझा करते हैं, और महत्वपूर्ण आध्यात्मिक अभियान में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में लोगों का स्वागत करते हैं। बच्चों की आकांक्षाओं और उनकी आध्यात्मिक शिक्षा की आवश्यकता से परिचित होकर, वे अपने प्रयासों का विस्तार करते हैं, ताकि युवाओं के आकर्षण के केन्द्र और समाज में धर्म की जड़ों को मजबूत करने वाली कक्षाओं में निरंतर बढ़ती संख्या में सहभागी सम्मिलित हों। वे किशोरों को उनके जीवन के महत्वपूर्ण चरण में दिशा देने में मदद करते हैं ताकि वे अपनी ऊर्जाओं को सभ्यता के विकास की ओर निर्देशित कर सकें। और जैसे-जैसे मानव संसाधनों की प्रचुरता बढ़ रही है, उनमें से अधिक-से-अधिक लोग अपनी आस्था को ऐसे-ऐसे उद्यमों के माध्यम से अभिव्यक्त कर पा रहे हैं, जो मानवता की भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ज़रूरतों को सम्बोधित करते हैं।
बच्चे किसी भी समुदाय की सबसे बहुमूल्य धरोहर हैं, क्योंकि उन्हीं में भविष्य का वचन और उसकी गारंटी छिपी है। उन्हीं में उस भावी समाज के चरित्र के बीज होते हैं, जो मुख्य रूप से उन वयस्कों के कृत्यों या उनकी निष्क्रियता पर निर्भर होता है, जो उस समुदाय के सदस्य होते हैं। बच्चे ऐसी धरोहर हैं, जिसे कोई समुदाय बिना परिणाम भुगते उपेक्षित नहीं कर सकता। बच्चों के प्रति सर्वसमावेशी प्रेम, उनसे व्यवहार करने का तरीका, उन्हें दी गई देखभाल की गुणवत्ता, वयस्कों का बच्चों के प्रति व्यवहार — ये सब जरूरी दृष्टिकोण के जरूरी पहलू हैं। प्रेम के साथ-साथ अनुशासन, बच्चों को जीवन की कठिनाइयों के अनुकूल बनाने का साहस — यह भी जरूरी है कि बच्चों की इच्छाओं का जरूरत से ज्यादा पालन न किया जाये, न ही उन्हें पूरी तरह उनके हाल पर छोड़ दिया जाए। ऐसा वातावरण बनाए रखा जाना चाहिए जिसमें बच्चे महसूस करें कि वे समुदाय का हिस्सा हैं और इसके उद्देश्य में सक्रिय भागीदार हैं।
अज्ञानता को बनाये रखना अत्यन्त गंभीर प्रकार का उत्पीड़न है; यह उन अनेक पूर्वाग्रहों की दीवारों को और मजबूत करता है, जो मानवजाति की एकता — जो बहाउल्लाह के प्रकटीकरण का लक्ष्य और संचालन-सिद्धांत दोनों है — की उपलब्धि के मार्ग में बाधा हैं। ज्ञान तक पहुँचना प्रत्येक मानव का अधिकार है, और उसके सृजन, अनुप्रयोग तथा प्रचार-प्रसार में भागीदारी वह जिम्मेदारी है, जो अपने अपने गुणों और क्षमताओं के अनुसार, सभी को संपन्न, समृद्ध विश्व सभ्यता के महान प्रयास में निभानी चाहिए। न्याय सार्वभौमिक भागीदारी की मांग करता है। अतः, जहाँ सामाजिक कार्य कभी-कभी वस्तुओं या सेवाओं की उपलब्धता तक सीमित हो सकता है, वहाँ इसका प्रमुख उद्देश्य किसी भी आबादी के भीतर ऐसी क्षमता का निर्माण करना होना चाहिए, जिससे वे एक बेहतर दुनिया की रचना में भाग ले सकें।
मानव इतिहास में, [व्यक्ति, संस्थाएँ, और समुदाय] के बीच परस्पर सम्बन्ध हर मोड़ पर कठिनाइयों से भरे रहे हैं—व्यक्ति स्वतंत्रता के लिए ज़ोर देता रहा, संस्था आज्ञापालन की माँग करती रही, और समुदाय अपनी प्राथमिकता का दावा करता रहा। प्रत्येक समाज ने अपने-अपने ढंग से इन तीनों के बीच सम्बन्धों को परिभाषित किया है, जिससे स्थिरता के युग उत्पन्न हुए, जो समय-समय पर अशांति से भी जुड़ गए। आज, इस संक्रमणकाल में, जब मानवता सामूहिक परिपक्वता प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रही है, ऐसे सम्बन्ध—केवल यही नहीं, बल्कि स्वयं व्यक्ति, सामाजिक संस्थाओं और समुदाय की धारणा—इतनी असंख्य-गिनती के संकटों से घिरी हुई है कि उनकी गिनती नहीं की जा सकती। अधिकार का विश्वव्यापी संकट इसका पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत करता है। इस अधिकार का इतना दुरुपयोग हुआ है, और इससे जो संदेह और आक्रोश उत्पन्न हुआ है वह इतना गहरा है कि सम्पूर्ण विश्व दिन-ब-दिन शासनीय रहना कठिन होता जा रहा है—और यह स्थिति सामुदायिक संबंधों की दुर्बलता के कारण और भी अधिक संकटपूर्ण हो गई है।
हर बहाउल्लाह के अनुयायी भली-भांति जानते हैं कि उनके प्रकटीकरण का उद्देश्य एक नई सृष्टि लाना है। “जैसे ही ‘उसके’ होंठों से पहली पुकार निकली, सम्पूर्ण सृष्टि में एक क्रांति आ गई और आकाश तथा पृथ्वी में जो कुछ भी है, वह अपनी गहराइयों तक सिहर उठा।” व्यक्ति, संस्थाएँ और समुदाय—दिव्य योजना के ये तीन मुख्य पात्र—सीधे ‘इनके’ प्रकटीकरण के प्रभाव के अन्तर्गत रूपाकार ले रहे हैं, और प्रत्येक के लिये एक नई अवधारणा, जो वयस्कता प्राप्त कर चुकी मानवता के अनुकूल है, प्रकट हो रही है। इन्हें आपस में बाँधने वाले सम्बन्ध भी गहरे रूपांतरण से गुजर रहे हैं, जिससे अस्तित्व के क्षेत्र में सभ्यता-निर्माण की वे शक्तियाँ प्रकट हो रही हैं, जो केबल ‘उनके’ आदेशों के अनुरूप चलने पर ही मुक्त हो सकती हैं।
वह ‘महान शांति’ जिसकी ओर सद्भावनासम्पन्न लोगों ने शताब्दियों से अपने हृदय की आकांक्षा को केन्द्रित किया था, जिसकी परिकल्पना अनगिनत पीढ़ियों के द्रष्टाओं और कवियों ने की थी और जिसका वचन लगातार युग-युग में मानवजाति के पवित्र धर्मग्रंथों ने दिया था, अब, अन्ततः, राष्ट्रों की पहुँच के भीतर दिखाई देती है। इतिहास में पहली बार प्रत्येक व्यक्ति के लिये यह सम्भव हो सका है कि सम्पूर्ण पृथ्वी को, उसके अनेकानेक विविध लोगों के साथ, एक परिप्रेक्ष में देखे। विश्व शांति न केवल सम्भव है, अपितु अपरिहार्य है। यह इस ग्रह के विकास की अगली अवस्था है…
परमाणु हथियारों पर प्रतिबंध लगाना, विषैली गैसों के प्रयोग को रोकना या जैविक युद्ध को अवैध घोषित करना युद्ध के मूल कारणों को दूर नहीं करेगा। हालांकि ऐसी व्यावहारिक व्यवस्थ ाएँ शांति प्रक्रिया के अनिवार्य अंग के रूप में जितनी भी महत्वपूर्ण क्यों न हों, स्वयं में वे केवल सतही हैं और स्थायी प्रभाव डालने के लिए अपर्याप्त हैं... एक सच्चे सार्वभौमिक ढांचे को अपनाया जाना चाहिए।
हर बीतते दिन के साथ, यह खतरा बढ़ता जा रहा है कि धार्मिक पूर्वाग्रह की प्रज्वलित होती ज्वालाएँ एक विश्वव्यापी दावानल का रूप ले लें, जिसके परिणामों की कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसे खतरे पर अकेली नागरिक सरकार काबू नहीं पा सकती। और न ही हमें खुद को इस भ्रांति में रखना चाहिए कि एक-दूजे के प्रति सहिष्णुता की अपीलें मात्र ही उन दुश्मनियों को शांत करने की आशा कर सकती हैं, जो अपने लिए दिव्य मंजूरी का दावा करती हैं। यह संकट धार्मिक नेतृत्व से अतीत की बंदिशों को तोड़ने की माँग करता है, ठीक वैसे ही निर्णायक ढंग से, जैसे समाज ने नस्ल, लिंग और राष्ट्र के घातक पूर्वाग्रहों को दूर करने के लिए मार्ग प्रशस्त किया था। विवेक के मामलों में प्रभाव डालने का जो भी औचित्य कहीं मौजूद है, वह मानवजाति के कल्याण की सेवा में निहित है। सभ्यता के इतिहास के इस अद्वितीय मोड़ पर ऐसी सेवा की ज़रूरतें और अधिक स्पष्ट नहीं हो सकती थीं। “मानवजाति का कल्याण, इसकी शांति और सुरक्षा तब तक प्राप्त नहीं की जा सकती,” बहाउल्लाह आग्रह करते हैं, “जब तक इसकी एकता दृढ़ रूप से स्थापित नहीं हो जाती।”
विश्व न्याय मंदिर के लेखों से और भी…
आप विश्व न्याय मंदिर के प्रमुख वक्तव्यों और उसके संविधान के बारे में अधिक जानकारी "लेख और संसाधन" भाग में पा सकते हैं।



