बहाई क्या मानते हैं
बहाउल्लाह और ‘उनकी’ संविदा
शोगी एफेंदी — बहाई धर्म के संरक्षक
शोगी एफेंदी के उद्धरण
- बहाई क्या मानते हैं
- सिंहावलोकन/अवलोकन
- बहाउल्लाह और ‘उनकी’ संविदा
- आत्मा का जीवन
- ईश्वर और ‘उसकी’ रचना
- आव श्यक सम्बन्ध
- विश्वव्यापी शांति
- बहाई क्या करते हैं
शोगी एफेंदी के लिखित कार्य लगभग मानवीय क्रियाओं और विचारों के प्रत्येक पहलू से जुड़े हुए हैं।
उनके पत्रों में बार-बार आने वाले विषय हैं: विश्वव्यापी बहाई समुदाय की प्रशासनिक संस्थाओं का विकास; व्यक्तिगत आध्यात्मिक जीवन का संवर्धन; बहाई धर्म का वैश्विक विस्तार और सुदृढ़ीकरण; इसके नियमों, शिक्षाओं और सिद्धांतों की व्याख्याएँ; धर्म का इतिहास जिसमें इसके केन्द्रीय व्यक्तित्वों की मर्यादा सम्मिलित है; और विश्व सभ्यता का इतिहास तथा उसके विकास को प्रेरित करने वाली शक्तियाँ।
नीचे शोगी एफेंदी की रचनाओं से कुछ संक्षिप्त अंश प्रस्तुत हैं।
बहाउल्लाह का प्रकटीकरण कितना व्यापक है! मानवजाति पर इस युग में बरसी उनकी आशीषें कितनी महान हैं! और फिर भी, उनकी महत्ता और गरिमा के प्रति हमारी समझ कितनी अल्प और अपर्याप्त है! यह पीढ़ी इतने महान प्रकटीकरण के इतने समीप खड़ी है कि उनके धर्म की अनंत संभावनाओं, उनके समस्त कार्य की अभूतपूर्व प्रकृति और उनकी आध्यात्मिक व्यवस्था के रहस्यमय विधान का वृहद मूल्यांकन नहीं कर सकती।
ईश्वर का उद्देश्य कोई और नहीं बल्कि मात्र वही है, जिसे केवल वही अपने विशेष तरीकों से साकार कर सकता है और जिसकी पूर्ण महत्ता को केवल वही समझ सकता है—अर्थात्, दीर्घकाल से विभाजित और पीड़ित मानवजाति के लिए ‘महान’ और ‘स्वर्णिम युग’ का आगमन। उसकी वर्तमान अवस्था, बल्कि उसका तात्कालिक भविष्य भी, अत्यंत अंधकारमय है, अत्यधिक दुखदायक अंधकार से भरी हुई है। किन्तु उसका दूरगामी भविष्य प्रकाशमान है, अत्यंत गौरवशाली रूप से प्रकाशमान—इतना कि कोई भी आँख उसकी कल्पना भी नहीं कर सकती।
हम जो तर्कसंगत रूप से कर सकते हैं, वह केवल इतना है कि हम उस प्रतिज्ञापित प्रभात की पहली किरणों की एक झलक पाने का प्रयास करें, जो समय के पूर्णता में, मानवजाति को घेरे हुये अंधकार को हटाने वाली है।
बहाउल्लाह का प्रकटीकरण, जिसका सर्वोच्च उद्देश्य संपूर्ण राष्ट्रों की जैविक और आध्यात्मिक एकता की प्राप्ति है, यदि हम इसके निहितार्थों के प्रति निष्ठावान रहें, तो उसके आगमन के द्वारा समूची मानवजाति की वयस्कता के आगमन का संकेतक माना जाना चाहिए।
कोई भ्रम न रहे। मानवएकता का सिद्धांत—वह धुरी जिसके चारों ओर बहाउल्लाह की सारी शिक्षाएँ घूमती हैं—मूर्खतापूर्ण भावुकता का कोई उग्र प्रस्फुटन या अस्पष्ट और धर्म-सम्मत आशा की केवल कोई अभिव्यक्ति नहीं है। इसका आकर्षण मात्र भाईचारे और सद्भावना की भावना के पुन: जागरण तक सीमित नहीं है, और न ही इसका उद्देश्य केवल विभिन्न जातियों और राष्ट्रों के बीच समरस सहयोग को बढ़ावा देना है। इसके निहितार्थ और भी गहरे हैं, इसके दावे पुराने सभी पैग़म्बरों द्वारा किये गये दावों से भी अधिक विशाल हैं। इसका संदेश न केवल व्यक्ति पर लागू होता है, बल्कि उन मूलभूत संबंधों की प्रकृति से मुख्य रूप से संबंधित है, जो सभी राज्यों और राष्ट्रों को एक मानव-परिवार के सदस्य के रूप में जोड़ना आवश्यक हैं। यह केवल किसी आदर्श की उद्घोषणा भर नहीं है, बल्कि एक ऐसी संस्था से अविच्छिन्न रूप से जुड़ा है जो इसकी सत्यता को मूर्त रूप दे, इसे प्रमाणित करे और इसके प्रभाव को चिरस्थायी बनाए रखे। यह वर्तमान समाज की संरचना में एक जैविक परिवर्तन की अपेक्षा करता है, जैसा कि दुनिया ने अब तक अनुभव नहीं किया है... यह मानव-विकास की पूर्णता का प्रतिनिधित्व करता है—एक ऐसा विकास, जिसकी सबसे प्रारंभिक शुरुआत पारिवारिक जीवन के जन्म में हुई, और जिसकी आगे की प्रगति जनजातीय एकता की उपलब्धि में हुई, आगे चलकर नगर-राज्य का गठन और फिर स्वतंत्र एवं संप्रभु राष्ट्रों की संस्था में विस्तार हुआ।
सम्पूर्ण मानवजाति की एकता उस अवस्था की पहचान है, जिसकी ओर मानव-समाज आज अग्रसर है। परिवार, जनजाति, नगर-राज्य और राष्ट्र की एकता के लिये क्रमवार प्रयास किये जा चुके हैं और वो पूरी तरह स्थापित हो चुके हैं। विश्व एकता ही वह लक्ष्य है, जिसके लिये परेशान मानवता प्रयासरत है।
बहाउल्लाह के विश्वव्यापी विधि का उद्देश्य क्या है, इसमें कोई शंका न रहे। यह समाज की वर्तमान नींव को ढहाने के लिये नहीं, बल्कि इसके आधार को व्यापक बनाने और इसकी संस्थाओं को एक ऐसे तरीके से रूपांतरित करने के लिये है, जो निरंतर परिवर्तित होती दुनिया की ज़रूरतों के अनुकूल हो। यह किसी न्यायसंगत निष्ठा में टकराव उत्पन्न नहीं करती, न ही आवश्यक वफादारियों को कमजोर करती है। इसका उद्देश्य मनुष्यों के ह्रदयों में विवेकपूर्ण और बुद्धिमान देशभक्ति की भावना को दबाना नहीं है, और न ही यह उस राष्ट्रीय स्वायत्तता के प्रणाली को समाप्त करने का ध्येय रखती है, जो अत्यधिक केंद्रीकरण की बुराइयों से बचाव के लिये आवश्यक है। यह न तो भिन्न जातीय उत्पत्तियों, न ही जलवायु, इतिहास, भाषा और परंपरा, विचार और अभ्यस्त व्यवहार की विविधता की अवहेलना करता है, जो दुनिया के लोगों और राष्ट्रों को अलग दर्शाती हैं। यह अधिक व्यापक निष्ठा और समस्त मानवजाति को प्रेरित करने वाली अधिक महान अभिलाषा का आह्वान करता है। यह एकीकृत विश्व के अपरिहार्य दावों के समक्ष राष्ट्रीय प्रवृत्तियों और हितों के अधीनता पर जोर देता है। यह एक तरफ़ अत्यधिक केंद्रीकरण का विरोध करता है, और दूसरी ओर सभी प्रकार की एकरूपता/एकसमानता के प्रयासों को ठुकराता है। इसका ध्येय-वाक्य है: “विविधता में एकता”…
आचरण की यह शुद्धता, जिसमें न्याय, समानता, सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, निष्पक्षता, विश्वसनीयता और विश्वासपात्रता के भाव निहित हैं, बहाई समुदाय के जीवन के हर पहलू में दृष्टिगत होनी चाहिए। बहाउल्लाह ने स्वयं घोषित किया है: “ईश्वर के साथी इस युग में वह खमीर हैं, जिन्हें संसार की जातियों को उठाना है। उनमें ऐसी विश्वासपात्रता, सत्यनिष्ठा और धैर्य, ऐसे कार्य और ऐसे चरित्र दिखाई पड़ें कि मानवजाति उनके उदाहरण से लाभ उठा सके।”
शोगी एफेंदी के लेखों से और भी..।
आप शोगी एफेंदी के कुछ लेखन और पत्रों के संकलनों के बारे में और अधिक जानकारी पा सकते हैं, तथा चयनित अंश लेख एवं संसाधन अनुभाग में पढ़ सकते हैं।
शोगी एफेंदी के प्रमुख कृतियों का पूरा पाठ बहाई सन्दर्भ ग्रंथालय में उपलब्ध है।







