बहाई क्या मानते हैं
बहाउल्लाह और ‘उनकी’ संविदा
बाब- बहाई धर्म के अग्रदूत
बाब के उद्धरण
- बहाई क्या मानते हैं
- बहाई क्या करते हैं
किसी भी दृष्टि से बाब के लेखों की मात्रा और गुणवत्ता असाधारण है। मात्र अपने मिशन के पहले चार वर्षों में ही, उन्होंने पाँच लाख पद्य लिखे। बाब ने अनेकों पत्र लिखे, जिनमें ईरान के शाह मुहम्मद शाह और देश के सभी प्रमुख धर्मगुरुओं को भी पत्र शामिल थे। अपने मिशन के आरंभिक काल में, बाब ने अधिकांश लेखन स्वयं अपने हाथ से किया। बाद में, पद्य सचिव को सुनाकर लिखवाए गए।
नीचे बाब के लेखों से कुछ चुनिंदा अंश प्रस्तुत किए गए हैं।
क्या ईश्वर के सिवा कोई कठिनाइयों को दूर करने वाला है? कहो: स्तुति है ईश्वर की! वही तो ईश्वर है! सभी उसके सेवक हैं और सभी उसके आदेशों का पालन करते हैं!
अपने आपको ईश्वर के अतिरिक्त सभी आसक्तियों से मुक्त कर लो, स्वयं को ईश्वर में सम ृद्ध रखो, उसके सिवा अन्य सभी चीज़ों से स्वयं को अलग कर लो, और यह प्रार्थना पढ़ो:
कहो: ईश्वर समस्त वस्तुओं के ऊपर सर्वथा पर्याप्त है, और आकाशों में, पृथ्वी में या जो कुछ इनके बीच है उसमें कुछ भी नहीं है, केवल ईश्वर, तुम्हारे प्रभु, ही पर्याप्त हैं। निश्चय ही, वह स्वयं में ही सर्वज्ञ, पालक, सर्वशक्तिमान है।
हे प्रभु! मैं आप की शरण में आता हूँ और आपके सभी चिन्हों की ओर अपना हृदय लगाता हूँ। हे प्रभु! चाहे मैं यात्रा में हूँ या घर पर, और अपने व्यवसाय या कार्य में, मैं अपनी पुरी आस्था आप पर ही रखता हूँ।
तो मुझे अपनी पर्याप्त सहायता प्रदान कर जिससे मैं सभी अन्य वस्तुओं से स्वतंत्र हो जाऊँ, हे वह, जो अपनी दया में अनुपम है! मुझे मेरा भाग दे, हे प्रभु, जैसे कि आपकी इच्छा हो, और मुझे उस हर चीज़ में संतुष्ट कर दे ज ो आपने मेरे लिए निर्धारित की है।
निर्देश देने का पूर्ण अधिकार केवल तेरा ही है।
सबसे अधिक स्वीकार्य प्रार्थना वह है, जो अधिकतम आध्यात्मिकता और चमक-उज्ज्वलता के साथ की जाए; उसकी अधिकता को ईश्वर ने पसंद नहीं किया है और न ही करता है। जितनी अधिक अनासक्ति और जितनी अधिक शुद्धता के साथ प्रार्थना की जाती है, वह ईश्वर की उपस्थिति में उतनी ही अधिक स्वीकार्य होती है।
यह उचित है कि सेवक को प्रत्येक प्रार्थना के बाद अपने माता-पिता के लिए ईश्वर से दया और क्षमा की प्रार्थना करनी चाहिए।
मैं वही प्रारंभिक बिंदु हूँ जिससे समस्त सृजित वस्तुएँ उत्पन्न हुई हैं। मैं उसी ईश्वर का प्रतापमयी स्वरूप हूँ जिसकी महिमा कभी मंद नहीं हो सकती, उसी ईश्वर का प्रकाश हूँ जिसकी दीप्ति कभी मंद नहीं पड़ सकती।
जिस तत्व से ईश्वर ने मुझे सृजित किया है वह वह मिट्टी नहीं है जिससे अन्य लोगों की रचना हुई है। ईश्वर ने मुझ पर वह अनुग्रह किया है जिसे सांसारिक बुद्धिमान कभी समझ नहीं सकते, और न ही आस्थावान जान सकते हैं।
एक आत्मा का मार्गदर्शन करना समस्त पृथ्वी के धन-संपत्ति के स्वामित्व से श्रेष्ठ है, क्योंकि जब तक वह मार्गदर्शित आत्मा दिव्य एकता के वृक्ष की छाया में है, वह और जिसने उसे मार्गदर्शन दिया, दोनों ही ईश्वर की कोमल दया के पात्र होंगे, जबकि सांसारिक वस्तुओं के स्वामित्व का अंत मृत्यु के समय हो जाएगा। मार्गदर्शन का मार्ग प्रेम और करुणा का है, न कि बलपूर्वक या ज़बरदस्ती का। यही ईश्वर का तरीका अतीत में रहा है और भविष्य में भी रहेगा!
संपूर्ण सृष्टि के स्वामी ने कभी कोई पैग़म्बर नहीं भेजा और न ही कोई किताब अवतरित की है, जब तक कि उन्होंने सभी मनुष्यों के साथ अपनी संविदा स्थापित नहीं की हो, जिससे वे अगले प्रकटीकरण और अगली किताब के स्वीकृति हेतु आग्रह करें; क्योंकि ‘उसकी’ कृपा की वर्षा निरंतर और असीमित है।
बाब के लेखों के बारे में अधिक जानकारी
बहाई संदर्भ पुस्तकालय में बाब द्वारा लिखित कई दृश्टिपत्रों (टेबलेट्स) को पढ़ा जा सकता है। उनके लेखों के बारे में अधिक जानकारी 'लेख एवं संसाधन' खंड में भी उपलब्ध है।







