“...सच्ची आस्था ईश्वर की एकता को स्वीकारने मात्र में नहीं है, अपितु एक ऐसा जीवन जीने में है जो सभी आदर्श और गुणों को प्रदर्शित करे।” अब्दुल-बहा

उपासना

भक्ति के कार्य धार्मिक जीवन में अन्तर्निहित हैं । इनके माध्यम से व्यक्ति और समुदाय निरन्तर उस अनूठे बंधन को प्रबलित करत ईश्वर और मानवजाति के बीच है। यह बंधन उन सम्बन्धों को जीवंत करता है जो समाज को पोषित करते हैं - व्यक्ति और समुदाय के विभिन्न तत्वों और संस्थाओं के बीच।

प्रार्थना हमारे आध्यात्मिक पोषण और विकास के लिये आवश्यक है। इसके माध्यम से हम ईश्वर का गुणगान कर सकते हैं और ‘उसके’ प्रति अपना प्रेम व्यक्त कर सकते हैं; साथ ही उससे सहायता की याचना कर सकते हैं। ध्यानमग्न होने की क्षमता मानवजाति का विशिष्ट लक्षण है। वास्तव में, बहाई लेखो में कहा गया है कि चिन्तन और मनन के बिना मानव की प्रगति असम्भव हो जायेगी। उपवास और तीर्थयात्रा भक्ति के दो ऐसे अन्य कार्य हैं जिन्होंने मानव-इतिहास के दौरान धार्मिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निबाही है। जब सेवा की भावना से काम किया जाता है तब वह भी उपासना का एक कार्य माना जाता है।


”अत्यन्त प्रसन्नता और मैत्रीभाव से तुम एकत्र हो और दयालु स्वामी द्वारा प्रकट किये गये पदों का गान करो। ऐसा करने से तुम्हारे अन्तर्मन के समक्ष सच्चे ज्ञान के द्वार खुल जायेंगे और तब तुम अनुभव कर पाओगे कि तुम्हारी आत्माएं अडिगता के आशीष को प्राप्त कर रही हैं और तुम्हारे हृदय दीप्तिमान आनन्द से भर उठे हैं।“

— बहाउल्लाह

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